दीवारें जिन में रंग अभी बाकी हैं हर ईंट बीते वक्त की कहानी इक सुनाती है आवाज़ें कुछ अभी भी सुनाई देती हैं हर कोने में पर अब खामोशी इस खंडहर में ज़रा ज़ोर से चिल्लाती है धूल जमी थी तस्वीरों पर, कोशिश की हटाने की धूल ही है शायद, कि हर तस्वीर से आँखें धुंधला सी जाती हैं क्या है ये खंडहर? रुका सा दिल, बिखरा सा घर? एक ज़माने में छूटा अधूरा सफर? हर सांस पे दिल के खालीपन से, कई बातें ज़ेहन में उतर आती हैं दीवारें जिन में रंग अभी बाकी हैं हर ईंट बीते वक्त की कहानी इक सुनाती है हर वो चीज़ जो पीछे रह जाती है अपने साथ जुडी एक याद तो छोड़ ही जाती है आगे बढ़ा था, ख्यालों के उस कल के लिए या शायद किसी मुश्किल, एक पहेली, कुछ सवालों के हल के लिए पर वक्त के साथ, वो कल, वो हल, वो खाली हर चीज़ अपने मायने खो जाती है हम बढ़ते तो आगे हैं, पर ख़ुशी पीछे छोटे मोड़ पर नज़र आती है वक्त है जनाब, और ज़िन्दगी, ये कहाँ रुकेंगे पर हर आगे लिए हुए कदम पर पीछे कुछ मंज़र तो ज़रूर दिखेंगे न बढ़ेंगे साथ इनके तो खुद ही से थ...
कल नये घर में घुसा तो देखा कुछ पंछियों ने एक घोंसला बना रखा था। घर साफ़ किया तो हटाना पड़ा उसे भई आख़िर घर तो मेरा ही था… खिड़की के पास एक कुर्सी लगा कर चाय की चुस्की लेते हुए बाहर देखा… दो मायूस पंछियों को नज़र अन्दाज़ कर, खुश हुआ जब अपने आस पास और भी बनी नयी इमारतों को देखा। इन इमारतों से पहले यहाँ कुछ खेत और बहुत से पेड़ थे शायद वो पंछी दोनों बाहर से यही याद दिलाना छह रहे थे… शायद । एक लंबी साँस ले कर अख़बार उठाया सरकार ने किसी ज़मीन को अपना बता कर बड़े हक़ से बुलडोज़र चलाया फिर खबर थी किसी देश की जिसने हल्ला बोल कर किसी और देश की ज़मीन पर अपना हक़ जताया और फिर आस पास ही की खबरों में कुछ लोग दबी आवाज़ में तो कुछ बहुत शोर से कुछ कहना चाह रहे थे, ख़ुद को इस देश का और कुछ लोगों को बाहर वाला बता रहे थे । अब कौन बाहर वाला है और किसका है हक़ ये कैसे पता चलता है? वक़्त में जितना पीछे चलते जाओ हर कदम नज़रिया बदलता रहता है…