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Showing posts with the label Poetry (Hindi)

बदलाव

 दीवारें जिन में रंग अभी बाकी हैं  हर ईंट बीते वक्त की कहानी इक सुनाती है  आवाज़ें कुछ अभी भी सुनाई देती हैं हर कोने में  पर अब खामोशी इस खंडहर में ज़रा ज़ोर से चिल्लाती है  धूल जमी थी तस्वीरों पर, कोशिश की हटाने की  धूल ही है शायद, कि हर तस्वीर से आँखें धुंधला सी जाती हैं  क्या है ये खंडहर? रुका सा दिल, बिखरा सा घर? एक ज़माने में छूटा अधूरा सफर?  हर सांस पे दिल के खालीपन से, कई बातें ज़हन में उतर आती हैं  दीवारें जिन में रंग अभी बाकी हैं  हर ईंट बीते वक्त की कहानी इक सुनाती है  हर वो चीज़ जो पीछे रह जाती है  अपने साथ जुडी एक याद तो छोड़ ही जाती है  आगे बढ़ा था, ख्यालों के उस कल के लिए  या शायद किसी मुश्किल, एक पहेली, कुछ सवालों के हल के लिए  पर वक्त के साथ, वो कल, वो हल,  वो ख़याली  हर चीज़ अपने मायने खो जाती है  हम बढ़ते तो आगे हैं, पर ख़ुशी पीछे छूटे मोड़ पर नज़र आती है  वक्त है जनाब, और ज़िन्दगी, ये कहाँ रुकेंगे  पर हर आगे लिए हुए कदम पर पीछे कुछ मंज़र तो ज़रूर दिखेंगे  न बढ़ेंगे साथ इनके तो ...

तस्वीर ही है बस अब, आप नहीं हो

"सिर्फ यादों का सिलसिला है और बातें हैं कि जाने वालों को होता है चले जाना सिर्फ " एक घर था छोटा सा, बस थोड़े से ही थे लोग।  बातें तो बहुत करते थे सब एक दूसरे से कुछ कह पाने का शायद वक्त न था सुनते भी थे बातें बहुत सी टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल और खुद की एल दूसरे की सुनने को शायद सब्र न था चल रही थी गाडी बिना रुकावट थी पहियों में, पुर्ज़ों में जब तक जान बराबर रुकने का तर्क न था फिर आया एक ऐसा मोड़, पड़ा एक पहिये पर ज़ोर रुकना पड़ा उसी पल सब को बांधे थी शायद कोई डोर  वो पल, बस एक पल ही था अब वक्त तो है, कुछ बात करो  सब्र भी है सब सुनने को रुकने को अब तर्क नहीं मैं ढूंढता तस्वीर से आपकी, कई सवाल हूँ मैं पूछता तस्वीर ही है बस अब, आप नहीं हो

नशा

जाने किस नशे में गुम होकर खुद ही से दूर हो गया मैं ज़िन्दगी के उलझे पन्नों में दिल की कलम को कहीं भूल गया मैं रौशनी थी खूब मेरे आस पास आँखें ही न खुल पायीं मेरी सोया था मैं खुश था कितना यूँ जागते ही ज़िन्दगी से मुलाकात हो गयी कुछ ऐसा है इस नशे का असर एहसासों में फर्क ही नहीं कर पाता अब दौड़ता हुआ सा दिखता हूँ खुद को रुकता हु तो अक्स दौड़ने लगता है, ठहरता हूँ तो सांस रुक सी जाती है आँखों के बंद होने और खुलने में फर्क महसूस नहीं होता अब दिन भर एक गहरी नींद में सपनों से दूर रहकर जागता हूँ जब आँखें बंद और सपनों की दुकान खुल जाती है

बस यूँ ही

कल   रात   यूँ    ही   एक   ख्याल   आया   मन   में कि   आखिर   तू   कौन   है   और   करता   क्या   है दिन   भर   आकाश   के   बदलते   रंग और   रात   में   तारे   बताते   हैं कि   तू   कलाकार   है   खुद   शायद   यूँ    तो   कला   को   ही   तेरा   नाम   देते   सुना   लोगों   को किस्मतें   लिखी   हैं   जैसे   तूने   सब   की अगर   ज़मीं   पे   होता   तू   तो   किताबें   लिखता   ज़रूर   तू और   हर   किताब   में   कुछ   पहेलियाँ   लिखकर उसके   किरदारों   के   सुलझाने   के   लिए   छोड़   देता लोग   तो   कहते   हैं   तू   सब   के   दिलों   में   बसता   है जब ...

अक्स

हर  तूफ़ान  के  बाद  बिखरी हुई सी शक्ल को सवाँर कर फिर सामने मेरे ऐसे ही दिखते हो  मुझे मेरी शक्ल से रु बरु कराते हो   --  कानू --

क्यों

नासूर की तरह मुझसे  जुड़ा  हुआ ये कल  आखिर चाहता क्या है  क्यों जुड़ते हैं ऐसे कल ज़िन्दगी में  क्यों दिया जाता है ये हक़ किसी को की मेरे ही आज और कल पर मेरे ही जज्बातों की स्याही बिखेर दी जाये और मेरी ही ज़िन्दगी के पन्नों पे मैं ढूंढता फिरू वो जो जो मैंने लिखना चाह था पर कभी कलम किसी और के हाथ में थी तो कभी किसी और की किताब भर रहा था मैं --  कानू --

बूंदें

कभी इक गरज के साथ बरसती हैं तो कभी ख़ामोशी से एक मुस्कुराती धूप में बह जाती हैं कभी तूफ़ान बनकर बहा ले जाती हैं सब तो कभी इक सहमी सी नदी की तरह बस राह बनाती हुई चलती जाती हैं बूंदें – चाहे अश्क हो या बरसात दिल को छूकर कुछ असर हर बार कर जाती हैं --  कानू --

सच...

जब भीड़ में रहकर भी अपना नहीं कोई दिखता तो सिर्फ अपने दिल ही का साथ होता है जो ज़िन्दा हो दिल तो शहर बसा रहता है जो बुझ जाये तो दश्त सा बन जाता है कभी खुद की मुश्किलों से खफा हो कर, कभी किसी और के दर्द की कराह सुनकर जाने कितनी बार कुछ बदलने का ख्याल मन में आया होगा पर जब भी दिल ने वो याद दिलाया, कल का आसरा देकर हमने दिल को बहलाया होगा जब कभी राह चुनने का मंज़र आया दिल की न सुनकर हमने भीड़ पर भरोसा दिखाया होगा और उसी राह पर चलकर अक्सर खुद को कभी तनहा तो कभी अधूरा पाया होगा पर दिल किसका है अपना ही तो है कुछ जो कल कहा था उसने, आज वो जीकर दिखाओ उसे फिर कोई राह मंजिल से पहले छूटेगी नहीं और दिल तुम्हें तनहा कभी छोड़ेगा नहीं... --  कानू --

कल

बात कुछ घंटों पहले की हो या कुछ सालों की उसे गुज़रा कल ही कहते हैं वो याद कुछ घड़ी भर की हो या एक अरसा जुड़ा हो उस याद से उसे बीते पल ही कहते हैं जुदा हुए कुछ लोग हों , या कुछ टूटी उमीदें बाकी सिर्फ यादें ही बचती हैं यादों में खो जाते हैं अक्सर हम और ज़िन्दगी बदली हुई सी लगती है कुछ आँखों में चमक लाती हैं कुछ चेहरे पे मुस्कुराहट और कुछ बस नम आँखों का एहसास छोड़ जाती हैं कुछ होठों को यूँ अचानक कुछ कह देने के लिए खुला छोड़ जाती हैं और कुछ घंटों तक चुप रहने का बहाना दे जाती हैं ये मन बस यादों में जाने के बहाने ढूंढता है भागती दौड़ती ज़िन्दगी को यु अचानक रोक कर मीलों पीछे भेज देता है कोई आवाज़ , कुछ शब्द , कोई तस्वीर , या फिर बस कागज़ का एक फटा हुआ सा पन्ना ही ज़िन्दगी के रेडियो का स्टेशन बदल देता है “कुछ कहा था उसने मुझसे , काश मैं भी कुछ कह देता ” “क्यों मैं चल दिया वहाँ से , काश खुद को रोक...